किशोर न्याय बोर्ड

“किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 प्रदेश में लागू है। अधिनियम का उद्देश्य - 18 वर्ष से कम आयु के विधि का उल्लंघन करने वाले किशोरों तथा देखरेख और संरक्षण के लिये जरूरतमंद बालकों को संरक्षण, भरण-पोषण, चिकित्सीय परीक्षण, उपचार एवं समग्र कल्याण तथा पुनर्वास है। ”

“किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 की धारा 4 के तहत् विधि का उल्लंघन करने वाले किशोरों के प्रकरणों का निराकरण करने हेतु किशोर न्याय बोर्ड के गठन का प्रावधान है। बोर्ड में एक अध्यक्ष, प्रधान न्यायाधीश तथा दो अशासकीय सदस्य (कम से कम एक महिला अनिवार्य) होते है। बोर्ड के अशासकीय सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। वर्तमान में प्रदेश के 50 जिलों में किशोर न्याय बोर्ड गठित है । वर्ष 2013-14 किशोर न्याय बोर्ड में 12075 प्रकरण प्रचलित थे। ”

किशोर न्याय बोर्ड के कार्य

  • विधि विवादित किशोरों के समस्त प्रकरणों का निराकरण करना।
  • किशोर द्वारा किये गये अपराधों का संज्ञान लेना।
  • विधि विवादित किशोर हेतु स्थापित एवं संचालित संस्थाओं की निगरानी।
  • बाल कल्याण समिति के साथ सम्पर्क स्थापित करना।
  • प्रकरणों के शीध्र निपटारे के लिए अन्य बोर्ड के साथ सम्पर्क।
  • विषेष किषोर पुलिस इकाई को निर्देषित करना।
  • जिला बाल संरक्षण इकाई से समन्वय रखना।
  • बाल अधिकारों को सुरक्षित करना।

किषोर न्याय बोर्ड के सदस्य के लिये चयन हेतु अर्हतायें

  • बाल अधिकारों सम्बंधी विषयों से सम्बंधित स्वस्थ्य, शिक्षा या अन्य कल्याणकारी क्रियाकल्पों की योजना, क्रियान्वयन तथा प्रषासन कम से कम 05 वर्षो से सक्रिय रूप से कार्य कर रहा हो।
  • किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि होना चाहिए
  • बाल कल्याण में प्रत्यक्ष रूप से संलग्न सामाजिक कार्यकर्ता,
  • कोई शिक्षक, कोई चिकित्सक, सेवा निवृत्त लोक सेवक, कोई व्यवसायी जो किषोरों से सम्बंधित कार्य में लगा हुआ।